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मेरे साठ के होने तक..

  ये उम्र भी न.. बड़ी कमबख़्त चीज़ है.. रुकती ही नही बढ़ती ही जाती है.. जैसे मुट्ठी में भरी रेत  फिसलती जाती है.. जैसे पर्वत की ढाल पर कोई चट्टान  लुढ़कती जाती है.. काश ज़िन्दगी की गाड़ी में भी ब्रेक लगा होता और ब्रेक लगाते उम्र का चक्का जम जाता ज़िंदगी मे कोई तो मुक़ाम आता जब एक उम्र पर जहां हम चाहे वक़्त थम जाता उफ्फ जो मेरे बस में ये होता तो तुमसे ज़रूर कह पाते कि मेरे साठ के होने तक तुम उनसठ पर ही रुक जाते... ये रिश्ता भी न... अजीब चीज है कभी फैलता जाता तो कभी सिकुड़ जाता है बिना मुझसे पूछे किसी से भी जुड़ जाता है न जात न धर्म न ख़ून कुछ नहीं पहचानता है हाईवे पे चलते- चलते दिल की गली पकड़ किसी भी ओर मुड़ जाता है क़ाश हमारा रिश्ता अभी दूरियों की भेंट न चढ़ता मेरा हृदय तुम्हे सामने रख आंखों की भाषा कुछ दिन तो और पढ़ता... उफ़्फ़ जो मेरे बस में ये होता तो तुमसे जुदा होकर भी हम रह पाते और तुमसे ज़रूर कह पाते. कि मेरे साठ के होने तक तुम उनसठ पर ही रुक जाते दर्द देकर जा रहे हो न तो सारी बातें बोल दूंगी आज आप सब के.. मैं राज़ खोल दूंगी बोल दूंगी कि सिस्टर कभी डाँटने के बाद कितना प्यार बरसाती थी...
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दरख्त

दरख्तों ने पहाड़ों को थाम रखा था  अब वे दरख्त ही न रह गए जब जड़ों ने उनकी मिट्टियां छोड़ दी  फिर पहाड़ भी ढह गए उनका चमन उजाड़ कर हमने आशियाँ तो बना लिया  पर सैलाब के कहर से कितने  गांव-ओ- शहर बह गए ये कुल्हाड़ी मुझ पर नहीं खुद पैर पे चलाई तुमने कटते हुए वे पेड़ सारे  मर-मर कर कह गए कि रखा था हिफाज़त से हमने  इस क़ायनात को हमको उजाड़ कर.. देखा ! तुम भी उजड़ गए...

जीवन साथी

मैं पेड़ हूं.. मैं हूं  मानव का जीवन साथी  मैं हवा को स्वच्छ कर ऑक्सीजन बनाता हूं  ताकि तुम सांस ले सको तपती धूप में अपनी काया से तुम्हें छाया देता हूं ताकि तुम विश्राम कर सको मैं मेहनत करता हूं  ताकि तुम खुलकर पनप सको  फिर मुझसे क्यों छीनते हो अधिकार खुलकर पनपने का ...? मेरी जड़ों को बांध देते हो अपनी सीमेंट की सड़कों से  दोस्त !क्या मुझे इतनी जगह दोगे कि मैं भी अपने पांव पसार कर  विश्राम कर सकूं...? में पेड़ हूँ में हूँ मानव का जीवन साथी मैंने फूल उगाए ताकि तुम्हारा घर ,आंगन , मंदिर   सुंदर और सुगंधित बने रसीले फल पैदा किये तुम्हारे स्वादिष्ट भोजन के लिए गुणकारी दवाओं का स्रोत हूँ मैं तुम्हारे स्वास्थ्य संरक्षण के लिए  मैं न्योछावर करता हूँ सबकुछ कि तुम फूलो-फलो-बढ़ो फिर मुझसे क्यों छीनते हो अधिकार फलने -फूलने का ? काट देते हो मुझे बढ़ने से पहले दोस्त ! क्या मुझे भी जीने दोगे ताकि मैं तुम्हे जीवन देता रहूं....? मैं पेड़ हूँ मैं हूँ मानव का जीवन साथी मैंने बादलों को बुलाकर बारिश करवाई  तुम्हारे खेतों के फसल लहलहाए मैंने अपन...

सोचा न था ये दिन.. (विदाई समारोह आशा दी एवं निवेदिता दी ) 13 मार्च 2021

सोचा न था ये दिन इतनी जल्दी आएगा.. 17 वर्षों का सफ़र साथ में  यूँ खत्म हो जाएगा...? रास्ते तो ख़त्म न होंगे जीवन तो चलता जाएगा मसरूफ़ आप भी हो जाएंगे रोज़ का मिलना न हो पायेगा सोचा न था ये दिन इतनी जल्दी आएगा   निवेदिता  दी, आपने बताया कि शांत रहकर  सटीकता से कैसे कर्तव्य निभाते हैं .. छोटों को भी आदर देकर  दिल कैसे जीते जाते हैं .... दूर बैठकर भी जो बातें  आंखों से कर जाते हैं  ऐसे साथी ऐसे रहबर  कभी न भूले जाते हैं इन आंखों का वो इशारा  अब तो कहीं खो जाएगा  सोचा ना था यह दिन इतनी जल्दी आएगा  आशा दी,  आप से सीखा  कि दूसरों से सीखते रहने में  ख़राबी कोई नहीं ... ग़लती हो जाए तो माफी मांगने में  बुराई कोई नहीं... 17 वर्ष हम थे अगल-बगल आपके चेहरे को पढ़ना था मेरा शगल  कितना कुछ कहना रह गया है कितना कुछ सुनना बाक़ी है कितने क़िस्से ..कितने लम्हे क़तरा-क़तरा  बाक़ी हैं .. जीवन की हलचल...ताना-बाना  उधेड़ना-बुनना बाक़ी है.. गुस्सा, प्यार ,लड़ाई, दुख- सुख  रोना- हंसना बाक़ी है  रह -रह कर मुझको अप...

चलो! इस नारी दिवस पर पुरुषों की बात करें..

https://www.facebook.com/watch/?v=254398816225627 आज महिला दिवस पर  चलो ..पुरुषों की बात करते हैं आप कहेंगे आज तो सब नारी की बात करते हैं  पुरुष भी नारी का गुणगान करते हैं,  नारी भी नारी को महान बताती है  हाँ तो यह सही  है ; बिल्कुल एतराज नहीं है हम औरतों को बराबरी का हक़ बमुश्किल मिला है  तो क्या संघर्ष का बखान न करें ?  घुट घुट कर जीवन का जहर पिया है  तो क्यों ना आज स्वयं का सम्मान करें?  लेकिन आज ही पुरुषों की बात करें  यह मैंने खुद से मांग कर  खुद को इजाजत दी है.... क्योंकि अर्धनारीश्वर का गुणगान करते हैं  तो आधा पुरुष भी है उसमें  हम भूल जाते हैं  मां के त्याग को याद रखते हैं  पिता के बलिदान को भूल जाते हैं बेटियों का मान रखने की चिंता में  कई बार बेटों के अरमान भी कुचल जाते हैं...  सोचती हूं  तो...  थोड़ा सा अनमना तो लगा था मुझे  उस दिन मेट्रो में  जब 18 वर्षीया के लिए 40 वर्षीय को  खड़े होते देखा  थोड़ी झेंप तो हुई थी  मुझे  जब 70 लोगों की लाइन को तोड़कर  ...

नारी तुम केवल श्रद्धा नहीं

नारी तुम केवल श्रद्धा नहीं ------------------------------– मासूम सी यादें जब उम्र के रास्तों पर बिखरी मिले.. तो चुन-चुन कर संजोना  अच्छा लगता है.... जबअंगुली का सहारा लिये दौड़े थे क़दम तो मंज़िल पे आके ही पाँव थे टिके... वो गर्व से भरे लम्हे गिन-गिन के बताना अच्छा लगता है... मालूम है तुम्हे क़दम से क़दम मिलाना क्या होता है.. खू ब जानती हो  कंधे से कंधा मिलाना कैसे होता है... सतरंगी चूड़ियाँ खनकाती हुई मेहनत का पसीना छलकाती हुई अंगुलियों का हुनर दिखलाती हुई रंगीला कशीदा काढ़ती हो फिर उन्हीं अंगुलियों में कलम थाम कर जोशीला क़सीदा लिख डालती हो तिरंगे की शान में... अपने हाथो की ख़ुश्बू से स्वाद घोल देती हो पकवान में... फिर उन्ही हाथो से सल्यूट ठोकती उड़ जाती हो आसमान में... कड़छी चलाने से लेकर देश चलाने तक कितने रूप हैं तुम्हारे तो कैसे न झुके सिर  तुम्हारे सम्मान में... क्योंकि नारी तुम केवल श्रद्धा नहीं शक्ति.. प्रेरणा.. हौसला..और बहुत कुछ हो...!

जीवन एक स्वप्न अनेक

See the video presentation of this poem on these two links :-  https://youtu.be/0tEQy1-ptvM       https://www.facebook.com/jaanojunction/videos/631353517742674/                जीवन एक स्वप्न अनेक  किन -किन को रखूँ संजोकर किन-किन को दूं फेंक           जीवन एक स्वप्न अनेक मन में अभिलाषा के अंकुर  पल-पल फूटते रहते हैं प्रयत्नों की खड्डी पर धागे  बुनते-टूटते रहते हैं आत्म-ग्रन्थ के शून्य पृष्ठ पर लिखूँ कितने लेख...?               जीवन एक स्वप्न अनेक कालचक्र के इस कुचक्र में इतना कुछ घटता रहता है श्रद्धा और इड़ा के द्वंद में शेष  मनु भटकता रहता है कितनो को विस्मृत करदूँ कितनो का करूँ उल्लेख...?               जीवन एक स्वप्न अनेक मन के नभ में नित विचार के व्योम उमड़ते जाते हैं हृदय-तटबंध से इच्छाओं के  ज्वार प्रबल टकराते है  कैसे बाँधू इन हहराते  भावों का अतिरेक...?       ...